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मोदी सरकार के घोटालो पर खोली ज़ुबान, तो मिलेगा मानहानि का तोहफा।

Written by Aadil Hussien

पढ़िए और खेल को समझिए। बिना जाने आप फिर कहते हैं कि इस सरकार में घोटाले नहीं होते.. ।  पिछले दिनों दो लेख EPW नाम की प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी जर्नल में छपे।  छपने के बाद हट गए। लिखने वाले ने इस्ताफा दे डाला मगर हंगामा उतना नहीं मचा जितना मचना चाहिए था। दरअसल एक-दूसरे से होड़ लेने वाले इस दौर में हम मुद्दों से भटक रहे हैं या फिर सफलतापूर्वक भटकाए जा रहे हैं। उस लेख में नरेंद्र मोदी की सरकार और अड़ानी की कंपनियों के बीच रिश्तों को लेकर कुछ संगीन आरोप लगाए गए थे।

आरोपों में दम था नतीजतन लेख लिखनेवालों को कंपनी के वकीलों ने चिट्ठी भेज दी। इस जर्नल के दो लेख- क्या अडानी समूह ने 1000 करोड़ रूपये की कर चोरी की? (प्रकाशन तिथि- 14 जनवरी, 2017) और मोदी सरकार द्वारा अडानी समूह को 500 करोड़ रूपये का फायदा (प्रकाशन तिथि- 24 जून, 2017) को हटाने की मांग की। इन लेखो ने मोदी सरकार धज्जिया उड़ा दी थी।

जर्नल प्रकाशित करनेवाले ट्रस्ट ने बैठक बुलाई और लेख हटाने का फैसला कर लिया। इधर लेख हटाने का फैसला हुआ और उधर छापनेवाले संपादक प्रंजॉय गुहा ठाकुरता ने इस्तीफा दे दिया। किसी भी सभ्य इंसान की तरह उन्होंने वजहें नहीं खोलीं लेकिन समझदार को आजकल इशारा भी ज़रूरत से ज़्यादा है। भारत के मामले में आपको समझना होगा कि यहां मीडिया के उन बहादुर लोगों को बचाने के लिए कोई संरक्षण नहीं है जो सरकारों या अमीर कंपनियों के खिलाफ खबरें लिखते हैं। मानहानि के भारी भरकम दावे ठोककर ऐसे पत्रकारों या पत्रकारिता संस्थान की आवाज़ दबाना आसान है जो आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं या फिर ऊंचे राजनीतिक संबंध नहीं रखते।

 

इस मामले में पार्टी अडानी ग्रुप है, और उसकी ताकत , चाहे वो राजनीतिक हो या आर्थिक भला कौन नहीं जानता है। ऐसे मामले भारत में आम हो चले हैं। इस मामले से पहले 4 महीने पहले वायर नाम की जनपक्षधर वेबसाइट पर एनडीए के नेता सांसद राजीव चंद्रशेखर ने भी 10 करोड़ रुपए के 2 मुकदमे ठोके थे। वायर ने 1.राजीव चंद्रशेखर के स्वामित्व वाले रिपब्लिक टीवी, 2. रक्षा मामलों की संसद की स्टैंडिंग कमेटी में उनका मेंबर होना और साथ ही 3. सैन्य क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों में उनके स्वामित्व के हितों के संभावित टकराव को लेकर लेख छापे थे।

 

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