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विश्व एकता की बात करने वाली सरकार के दिल में रोहिंग्या मुसलमानों के लिए रत्ती भर जगह नहीं…

Written by Kumar

रोहिंग्या मुसलमान महज एक शरणार्थी नहीं है बल्कि अपने ही जख्मो को कुरेद कुरेद कर जीते एक अद्वितीय साहस की मिसाल है ! आज वक़्त की करवट का शिकार एक बार फिर रोहिंग्या मुसलमान बन गए ! अरसों पहले घर से बेघर हो चुके ये मुसलमान एक बार फिर अपने और अपने परिवार के लिए बसेरा जुटाने निकल चुके है ! हमारे देश में इन इनको अपनाने और न अपनाने को लेकर बेशक भतेरे तर्क कुतर्क किये जा रहे हो पर मानवीय आधार पर इन्हें भी जीने का हक तो है ! अपने अधिकारों का विनाश, अपनी स्वतंत्रता का विनाश तो हमने देखा और सहा है पर इनके दर्द का क्या जिनके पास अपना कहने लिए घर तो क्या एक देश भी नहीं है ! ऐसे संवेदनशील मसले पर राजनीति करना तो कही से भी जायज नहीं है, पर राजनीति हो भी क्यों न ये उन लोगो में से ही एक है जो नेताओं का वोट बैंक नहीं है !

कुछ ऐसी ही कहानी है इनकी –

साल 2012 की गर्मियों की एक रात ने नूरउल इस्लाम की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया. उस रात ने उसके परिवार की किस्मत में म्यांमार के रखाइन राज्य से आए शरणार्थियों का तमगा लगा दिया ! उस समय नूरउल की उम्र महज़ सात साल थी लेकिन उन्हें अच्छी तरह याद है कि कैसे उग्रवादियों ने रखाइन में उनके घर पर हमला बोला था ! उन्हें यह भी याद है कि कैसे वे मौत के मुंह से बचकर भागे थे और बांग्लादेश में उनके संघर्ष के शुरुआती दिन कैसे थे, वहां से उन्हें निकाल दिया गया था और फिर वे भारत पहुंचे !

किस्से को याद करते वो कहते है  ‘हमारी स्थिति वाकई बहुत ख़राब थी क्योंकि मेरे पिता के पास हमारे पालन-पोषण के लिए पर्याप्त धन नहीं था ! जब तक हम भारत नहीं पहुंचे और मेरे पिता ने रोज़गार के लिए मछली बेचना शुरू नहीं कर दिया, तब तक हमें कई दिन तक भूखा रहना पड़ा.’

नूरउल का परिवार उन 70 परिवारों में से एक है, जो दक्षिणी दिल्ली के एक कोने में स्थित शाहीन बाग के एक शिविर में रह रहे हैं ! रोहिंग्या शरणार्थी वे लोग हैं, जिनका वास्तव में कोई ठिकाना नहीं है ! संयुक्त राष्ट्र ने इन्हें दुनिया का सबसे अधिक प्रताड़ित अल्पसंख्यक समुदाय माना है !

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